11/28/2018

इतिहास के सूत्र: बस्तर के मंदिर

मै बस्तर का रहने वाला हूॅ और बस्तर की बात बताता हॅू। प्राचीन बस्तर को अनेक नामें से जाना जाता था । महाकंतार? महअटवि, दण्डकारण्य, भ्रमरकोट, और चित्रकोट ।

दंतेवाडा मंदिर (फोटो अभिषेक )
 एर्राकेट चपका,  केसरपाल, टेमरा, नारायणपाल, गढ़िया, ढोढरेपाल चित्रकोटख् कुरूसपाल सोनारपाल, अड़ेंगा, गढ़ धनोरा  भेंगापाल, समलूर चिंगीतरई छज्ञेटेडोंगर, बड़ेधाराउर बोदरा  छिंदगांव, सिंगनपुर घेटिया, बस्तर, केशकाल, मद्देढ़ , भोपालपट्टनम भेरमगढ़, बारसूर तथा दंतेवाड़ा आदि ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के क्षेत्र है जहां पर पुरवशेष प्राप्त होने का सिलसिला आज भी जारी है।

बस्तर के प्रमुख राजवंश:


पुरातात्विक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि यहां लम्बे समय तक नल-नागवंश के शासकों की हुकुमत चलती थी। जो चौदहवीं सताब्दी तक मानी जाती है। दोनों राजवंशों की राजधानी इंदिरावती नदी के तट पर ही थी । नलवंश के बाद बस्तर में छिदंक  नागवंश का शासन काल था। इतिहास कारों की माने तो नाग वंशीय शासन काल में ही मंदिरों का निर्माण हुआ जो आज भैरमगढ दंतेवाड़ा, बारसूर में स्थित है और बस्तर के इतिहास को जानने समझने का सूत्र देते है । 

छिंदक नागवंश के पश्चात बस्तर में चालुक्यवंष ने चौदहवी षताब्दी से लेकर 1947 तक राज्य किया । देष में स्वतंत्रता के बाद जनवरी  1,  1948 को भारत के विभिन्न गणराज्यों  के साथ बस्तर राजतंत्र को भी लोकतंत्र में विलीन कर दिया गया । 
इस ब्लॉग का उद्देष्य है कि आपके समक्ष बस्तर के उन एतिहासिक जगहों के बारें में एक झलक बताना जिन्हें जानने का हर बस्तरवासी को हक है ।

क्या खास है बारसूर में :-


बस्तर के समृद्धशाली इतिहास में बारसूर का विशेष स्थान है। बस्तर के कई राजवशों के उदय और पतन की गाथाएं इतिहास के पन्नों में मिल जाती है।
बारसूर मंदिर (फोटो- अभिषेक )
एक मान्यता के अनुसार बारसूर का नामकरण बाणसुर के नाम पर हुआ। जब आप बारसूर में जाए तो आपको एतिहासिक महत्व के भवन कई जगहों पर मिल जाएंगे । बारसूर में सवत्र प्राचीन प्रतिमाएं विखरी पड़़ी है। यहां के गणें मंरिए पेदम्मा गुड़ी,मामा-भांचा मंदिर, बत्तीसा मंदि, चन्द्रादित्य मंदि पहाड़ी चट्टान पर स्थित हिरमराज मंदि, सोलह खंबा, मावली मंदिर सहित अनगिनत ज्ञात-अज्ञात पुरातात्विक धरोहर मौजूद है। प्रचलित लोक कथा के अनुसार यहां 147 तालाब और उतने ही देवालयों का निर्माण किया गया िा। यहीं कारण है कि आज भी अनेक तालाब और मंदिर अवषेश के रूप  में मौजूद है।

बारसूर में अनेक प्रतिमाए मौजूद है जो छिंदक नाग वंशीय कला की उत्कृष्ट मिसाल देती है । यहां एक छोटे संग्राहलय में षिव-पार्वती, विश्णु, काली भेरव, चामुण्डा, ब्रम्हा, लक्ष्मी गणेश ,दिक्पाल आदि की प्रतिमाएं सुरक्षित रखी गई है। 
बारसूर स्थित पेदम्मगुड़ी जहां कम ही लोग पहूॅचते है। पदम्मा को तेलुगु शब्द है "बड़ी मां" । दंतेश्वरी के एक रूप को पदम्मा यानि बड़ी माई के नाम से भी जाना जाता है। बारसूर में पेदम्मा गुढ़ी मौजूद है जिसमें कहा जाता है कि दंतवाड़ा की दंतेश्वरी की मूर्ति सबसे पहले यहीं स्थापित की गई थी बाद में इसे दंतेवाड़ा ले जाकर स्थापित किया गया ।

दंतेवाड़ाः- 

आज दंतेवाड़ा एक शक्ति पीठ है के रूप् में विख्यात है और दंतेश्वरी देवी को ,देवी दुर्गा का प्रतिरूप मान पूजा की जाती है । देवी मां के मुख मण्डल में अपूर्व तेजस्विता विद्यमान है जिनकी आंखे निर्मित है। गहरे चिकने काले पत्थरों से निर्मित मूर्ति के छः भुजाएं है जिनमें शंख, खड्ग त्रिशूल, घंटा पाश और एक हाथ से राक्षस के बाल पकडे़ हुए  है । मूर्ति का एक पॉव सिंह पर रखा हुआ है । माई जी प्रतिमा के पैरां के समीप राहिनी ओर एक पाद भेरव की मूर्ति तथा बाई ओर भैरवी की मूर्ति स्थापित है माई दंन्तेश्वरी जी के भव्य मूर्ति के पीछे पृष्ठ भाग पर मुकुट के उपर पत्थर से तराशी गई कलाकृति, नरसिंह अवतार के द्वारा हिरण्य कश्यप के संहार का दृश्य है।

इसे भी देखें:- नारायण पाल मंदिर  


11/19/2018

तुलसी विवाह की कहानी

वैसे तो भारत में त्योहारों का सिलसिला सितम्बर में ही शुरू हो जाता है और प्रत्येक त्यौहार का अपना महत्व होता है / तुलसी हम सभी जानते है और इसके औषधीय गुणों से सभी भली- भांति परिचित है /  दीपावली के 11 दिन में हम एक त्यौहार
तुलसी पौधा (फोटो गूगल)
तुलसी पौधे को ही समर्पित करते है जिसे तुलसी विवाह या एकदशी कहा जाता है / इस ब्लॉग के माध्यम से मै आपको तुलसी विवाह मनाये जाने के बारे में बताता हूँ / 





बस्तर में मनाये जाने वाले त्योहारों के बारे में जानने के लिए नीचे  दिए गए लिंक पर क्लिक कीजिये /
नयाखानी क्या है ?  


तुलसी के औषधीय गुणों की वजह से ही आयुर्वेद तुलसी के पत्ते को एक औषधि के रूप में आदि काल से उपयोग करता आया है / अगर तुलसी विवाह के पौराणिक रूप में नज़र डाले तो एक नयी कहानी निकल कर आती है / जिसे यहाँ चर्चा करना ज़रूरी हो जाता है /

कौन थी तुलसी :-

पुराणों  में तुलसी के बारे में ज़िक्र किया गया है / इस में यह कहा गया है कि तुलसी राक्षस कुल में जन्मी के विष्णु भक्त थी / उसका नाम वृंदा था , उसकी भक्ति से भगवान् खुश रहते थे , आगे चल कर उसका विवाह रक्षक कुल में ही जालंधर नाम के राक्षस से हुआ / 

देवता-असुर की लड़ाई:-

एक समय जब एसा आया कि देवता और राक्षसों में जंग छिड़ी , और जालंधर को भी उसमे हिस्सा लेना पड़ा / जब जालंधर लड़ाई में जाने लगा तो तुलसी ने उसे विदा करते समय कहा कि जब तक आप नही लौटेंगे मै आपके लिए पूजा-अर्चना करती रहूंगी !
तुलसी ने वैसा ही किया , तुलसी की भक्ति के बल पर जालंधर देवताओं पर भारी पड़ने लगा और देवता लड़ाई के मोर्चे पर हरने लगे / 
Tulsi plant at the courtyard (Photo-Google)

इधर जालंधर को भी घमंड  हो गया की उसे कोई नही हरा सकता / और वह स्वर्ग की दूसरी कन्याओं पर अत्याचार करने लगा / तब देवताओं ने भगवान् विष्णु के पास जाकर विनती की और कहा की इससे तो मानव जाती का विनाश हो जाएगा और कोई भी नही बचेगा ?  विष्णु ने कहा ये वृंदा की भक्ति की ताकत है जिससे जालंधर की विजय हो रही है /

विष्णु भगवान् का वह कदम:-   

तब विष्णु ने देवताओं की विनती पर ,मानव जाति के लिए जालंधर के रूप लिया और वृंदा के पास गए , वृंदा ने भी अपने पति को सुरक्षित पाकर अपनी प्रार्थना बंद कर दिया /
उधर जालंधर की शक्ति प्रार्थना के बंद होते ही ख़त्म हो गई और वह देवताओं के हाथों मारा गया /

कौन है शालिग्राम:-

भगवान् को पत्थर बनना पड़ा -जब वृंदा को ये बात पता चली तो उसने  गुस्से में भगवान् को श्राप दिया जिससे विष्णु पत्थर के बन गए / भगवान् के पत्थर बनते ही देवताओं में हडकम्प मच गया वे वृंदा के पास जाकर श्राप वापस लेने का अनुरोध करने लगे जिसे वृंदा मान गई और भगवान्  विष्णु को फिर से उसी रूप में आ गए मगर वृंदा के साथ किया गए कृत्य पर वे काफी लज्जित हुए , और वृंदा के श्राप को जिन्दा रखने के लिए अपना एक प्रतिरूप एक पत्थर में भी रखा जिसे शालिगराम कहा जाता है /
Tulsi Vivah (Google-photo)

तुलसी कैसे बनी वृंदा:-

इधर वृंदा श्राप वापस लेने के बाद सती हो गई और उसके चिता की राख से एक पौधा निकला जिसे तुलसी कहते है /
और आगे चलकर वृंदा की मर्यादा और पवित्रता के लिए देवताओं ने तुलसी और शालिग्राम का विवाह कार्तिक शुल्क एकादशी (देव प्रबोधनी एकादशी ) को करा दिया / भगवान् विष्णु ने भी शालिग्राम के रूप में तुलसी को लक्ष्मी से ज्यादा दर्जा दिया और कहा कि मै बिना तुम्हारे कुछ भी खाने की चीज़े स्वीकार नही करूँगा  और इसीलिए बिना तुलसी को चड़ाए भगवान् विष्णु को नही चड़ाया  जाता है / इसीलिए तुलसी का स्थान हमेशा शीर्ष में ही होता है / इसी दिन कार्तिक एकादशी होती है / 
उम्मीद है आपको ये ब्लॉग पसंद आया होगा / अपने कमेंट ज़रूर लिखे ! 


11/05/2018

Statue of Unity

आज मै “स्टेचू ऑफ़ यूनिटी”  यानि “एकता की मूरत” के बारे में चर्चा करने जा रहा हूँ , जिसे हाल ही में प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को समर्पित किया / इसमें गर्व करने वाली बात ये है कि यह मूर्ति विश्व की सबसे ऊँची मूर्ति बन चुकी है और पर्यटन के लिहाज से यह पर्यटन प्रेमियों के लिए सदा आकर्षण का केंद्र है और रहेगी   / इसकी ऊँचाई 182 मीटर है यानि 597. 113 फीट है / ये मूर्ति भारत के प्रथम उप- प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की है / आज़ादी के बाद देशी रियासतों के विलय करण में उनके अमूल्य योगदान को कृतज्ञ राष्ट्र हमेशा याद रखेगा / यह मूरत एक प्रयास है उनके योगदान को याद करने का / 
अब इसके अन्दर क्या है इसकी बात करते है मगर इससे  पहले विश्व की दूसरी अन्य ऊँची इमारतों का ज़िक्र करना भी लाज़मी हो जाता है/
सरदार पटेल की 182 मीटर मूर्ति 
 

दूसरी बड़ी मूर्तियाँ दुनिया में और  कहाँ-कहाँ है ?

बुद्ध स्प्रिंग मंदिर है जो चीन में है जिसके ऊंचाई – 153 मीटर है यानि 29 मीटर कम
फिर अमेरिका की स्वतंत्रता की मूर्ति है जो 93 मीटर है और 89 मीटर कम है / 
तीसरे नंबर पर है रूस में स्थित मदर लैंड कॉल्स नामक मूर्ति है जो 85  मीटर यानि 97 मीटर कम है /
और 40 मीटर की चौथे नंबर पर है क्राइस्ट रिडीमर है  और ये ब्राज़ील में है /  और ये भी 142 मीटर कम है /  
दुसरे शब्दों में भारत की “स्टेचू आफ यूनिटी” विश्व की सर्वोच्च मूर्ती है /
विश्व में मौजूद विशाल काय मूर्तियों का तुलनात्मक अवलोकन 

भारत में कहाँ है ये मूर्ती ?   

 विश्व की सबसे बड़ी मूर्ति होने का गौरव अब जिसे प्राप्त है वो स्थित है गुजरात के केवड़िया में और ये गुजरात के बड़ोदरा  से 90 किमी दूर  और सरदार सरोवर बांध के नजदीक बनी है जिसका नाम है साधू बेटा द्वीप  और ये द्वीप नर्मदा नदी में है  /
250 इंजिनियर तथा 3 हज़ार 400 मजदूरों की कड़ी मेहनत के बाद 3 साल 9 महीने में ये तैयार हो पाया /
गुजरात सरकार तथा केंद्र सरकार के संयुक्त योगदान के चलते इसे बनाने में 2,97 9 करोड़ रूपये लगे /
सरदार पटेल की मूर्ति के डिज़ाइनर सुतार
 स्वनिर्मित महात्मा गाँधी की प्रतिमा के साथ 

क्या लगा है इसे बनाने में :- 

सबसे पहले तो मै बात करता हूँ मैटेरियल्स की तो इसे बनाने में सत्तर हज़ार मीट्रिक टन सीमेंट लगा है /
2 लाख 12 हज़ार क्यूबिक मीटर कंक्रीट लगा है  इतना ही नही1 8 हज़ार टन रेंफोर्स स्टील और 6 हज़ार 500 मीट्रिक तन स्ट्रक्चरल स्टील लगा है,
इसमें 22 हज़ार स्क्वायर मीटर कांसे की प्लेटें लगी है / इन सबका वज़न मूर्ति  के पैरों में आ रहा था तथा देश में मौजूद सभी ढलाई घरों के लिए ये मुश्किल हो रहा था तब चीन की कम्पनी जियांग्जी  टोकिन कंपनी को ये काम सौंपा गया फिर ढलाई का काम शुरू होते ही  एक एक करके कांसे की प्लेटें चीन से आने लगी / कुल 7 हज़ार प्लेटें लगी है / और ये प्लेट वेल्डिंग द्वारा एक दुसरे से जुडी है /
93 वर्षीय प्रसिद्ध मूर्तिकार राम सुतार ने इस विशाल काय मूर्ति की डिजाईन तैयार की है , पद्मश्री तुषार ने महात्मा गाँधी की मूर्ति भी बनायीं है जिसे न केवल भारत बल्कि रूस, इंग्लैंड , फ्रांस तथा इटली में स्थापित किया गया है /

क्या खूबियाँ है इसमें ? 

ये 180 किमी प्रतिघंटे की रफ़्तार से चलने वाली हवा को ये मूर्ती सहन कर सकती है तथा 12 किमी के परिधि में 6.5 रिएक्टर स्केल के भूकम्प जो  पृथ्वी के 10 किमी अंदर होंगे उसे ये सहन कर सकती है / इतना ही नही पिछले 100 वर्षों के बाड़ रिकॉर्ड को ध्यान में रखकर इसकी ऊंचाई बनाये गई है /
इस मूर्ति को 5 जोन में  विभाजित किया गया है जिसमे लाइब्ररी , सरदार पटेल मेमोरियल, सरदार सरोवर बांध का आकाशीय अवलोकन किया जा सकता है /
पर्यटन के लिहाज से इस प्रतिमा से सरकार को लाखो में आमदनी होने की उम्मीद है /
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How to track measles and rubella


10/03/2018

पितृ पक्ष क्या है ?

गणेश चतुर्थी के तत्काल बाद पितृ  पक्ष की शुरुवात होती है और ये 15 दिनों का यानि एक पखवाड़े का होता है इस वर्ष यह 24 सितम्बर से 8 अक्टूबर तक रहेगा /
धार्मिक अनुष्ठान पितृ पक्ष में (फोटो -गूगल) 
 

आइये जाने क्या है पितृ  पक्ष :-

हिन्दू मान्यता के अनुसार मरने के बाद तीन पीड़ी की आत्माए पितृ लोक में निवास करती है जिसका स्वामी यमराज होता है और यह स्वर्ग और पृथ्वी लोक के बीच स्तिथ होता है / जब सूर्य तुला राशि में प्रवेश करता है (यानि सूर्य अपनी स्तिथि बदलता है ) तब पितृ लोक में रहने वाली तीन पीड़ियों की आत्माएं पृथ्वी में आती है अपने-अपने परिवार के घरों पर 16 दिनों तक रहती है,  (जब तक  सूर्य पुनः अपनी स्तिथि परिवर्तन नही कर लेता )
अतिथि सत्कार (फोटो-गूगल )
इसी दौरान प्रत्येक व्यक्ति को अपने पूर्वजो को आदर सम्मान करना चाहिए दुसरे शब्दों में जो पितृ लोक में रहते है उन्ही का ही पितृ पक्ष श्राद्ध या तर्पण किया जाता है ये होता है भाद्र पूर्णिमा से अश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक यानि 16 दिनों का ये अन्तराल “पितृ पक्ष कहलाता है / 22 से 23 सितम्बर से इसकी शुरुआत होती है /

इसकी शुरुआत कैसे हुई ? 

कहते है महाभारत काल में जब कर्ण की मृत्यु हुई तो स्वर्ग में उनको खाने के लिए केवल स्वर्ण ही परोसा गया जबकि कर्ण को वास्तविक भोजन की आवश्यकता थी /कर्ण के प्रश्न करने पर इंद्र ने उत्तर दिया “तुमने जीवन भर केवल स्वर्ण ही दान में दिया इसीलिए इसे ही खाना होगा/ तुमने कभी अपने पूर्वजो को भोजन नही कराया “ इस पर कर्ण ने कहा मैंने तो अपने पूर्वजो को पुरे जीवन काल में जाना ही नही तो कैसे ये करता ? इसपर कर्ण को 15 दिवस के लिए पृथ्वी पर भेजा गया ताकि वे अपने पूर्वजो का तर्पण /श्राद्ध कर सकें / कहते है उसी समय से पितृ पक्ष की शुरुआत हुई /

क्या विधान होते है पितृ पक्ष में ?
धार्मिक अनुष्ठान (फोटो -गूगल )

विधान के अनुसार इस दौरान अगर आप अपने पूर्वजो को संतुष्ट कर गए तो आपको धन , समृधि –सम्पदा का आशीर्वाद आपको देते है /
पितृ पक्ष अपने पूर्वजो का आशीर्वाद प्राप्त करने का सुनहरा मौका देता है ,अब सवाल ये उठता है ये आशीर्वाद कैसे प्राप्त किया जा सकता है और क्या नही करना चाहिए तथा क्या क्या करना चाहिए /

  • इस मौके पर कोई शुभ कार्य (शादी, नया मकान, ज़मीन, वाहन नए कपडे खरीदना वगैरह)  नही करना चाहिए /
  • कुल की मर्यादा के विरुद्ध कार्य नही करना चाहिए
  • झूठ या धोखे देने से बचना चाहिए /
  • मांसाहार नही करना चाहिए
  • उधार लेने देने का कार्य न करें
  • मकानों का मरम्मत करवाना भी वर्जित है/

अब मै उन बातों को कहता हूँ जो इस दौरान प्रत्येक को करना चाहिए/ 
  • सबसे पहले पुरे पक्ष में पितरों का तर्पण करना चाहिए , तर्पण के दौरान जल, पुष्प, तिल , कुश का अवश्य प्रयोग करना चाहिए
  • यथा संभव दूसरों की मदद करें (तन मन व धन से ) यानि दान अवश्य करे / 
  • सात्विक (सादा ) भोजन करें, अगर संभव हो तो प्याज लहसुन का भी सेवन न करें /  
  • धार्मिक आचरण करे / समाज विरुद्ध कार्य न करें जिससे आपके परिवार तथा कुटुंब को शर्मिंदा होना पड़े

अच्छा ! एक ख़ास बात तो और है इसमें ,-
पूर्वजो को संतुष्ट करने का यह विधान भारत में ही नही बल्कि दुनिया के अगल –अलग हिस्सों में देखने को मिलता है /
चीन में इसे “छिंग मिंग” नाम से मनाया जाता है जिसका अर्थ है “साफ़” और “उज्जवल” ये 15 दिनों का तो ज़रूर होता है मगर 5 अप्रैल को शुरू होता है /
जल तर्पण (फोटो -गूगल )

क्या करते है चीनी इस दौरान :- 

चीनियों में इस दौरन कब्रिस्तान जाकर मोमबत्ती जलाने का रिवाज होता है तथा / पारिवारिक सदस्य वरीयता क्रम में समाधी के तीन चक्कर लगते है /
पूर्वजो को भोजन कराते है और खुद ठंडा खाना खाते है /

इसी प्रकार जर्मनी में नवम्बर को पहली तारीख (जब हम छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस मानते है ) इसे “आल सैंट डे” कहते है /

हंगरी में “ ghost festival” के रूप में इसे मनाने की प्रथा है इसके आलावा इसे सिंगापूर, मलेशिया, जापान , थाईलैंड ,लाओस, वियतनाम,कम्बोडिया, ताईवान, इंडोनेशिया में भी मनाया जाता है –

खास बात यह है कि यह अवसर  हर जगह 15 दिनों का ही होता है /

कृपया इसे भी देखे :-










9/27/2018

नवाखानी त्यौहार

बस्तर में सितम्बर के महीने से ही एक के बाद एक त्योहारों का दौर शुरू हो जात है / हालाँकि , हर फसल को खाने के बाद उसकी पूजा अर्चना करना यहाँ का रिवास है जैसे गर्मियों में आम लगने के बाद उसकी पूजा कर के ही उसे खाने का यहाँ रिवाज है , और इसीलिए यहाँ “ आमा तिहार”  (आम का त्यौहार ) मनाया जाता है  बहरहाल, बारिश के बाद जिस त्यौहार का बेसब्री से इंतज़ार होता है वह है –“नया खानी” यह त्यौहार लगातार 15 दिनों तक चलता है और किसान इसे अपनी सुविधानुसार मनाता है /

धान की फसल पर बैठी चिड़िया (फोटो- Jagdalpur online

क्या है “नवाखानी”?


बस्तर में किसी भी फसल के उपयोग से पहले उसकी पूजा अर्चना की जाती है, इसीलिए जब अन्न (धान की फसल ) पक जाती है तो उसको उपयोग करने से पहले एक त्यौहार मनाया जाता है जिसे “नयाखानी” कहते है/ ये त्यौहार अन्य फसलो के त्योहारों से ज्यादा अहमियत रखता है / एसा इसलिए क्योंकि इस त्यौहार में  देवी अन्नपूर्णा यानि लक्ष्मी की पूजा की जाती है जो हमें अन्न प्रदान करती है  और अन्न यहाँ का प्रमुख भोजन है /

कैसे मनाया जाता है नवाखानी यहाँ ?


धान की फसल 60 दिन में तैयार हो जाती है इसीलिए इसे सठिया कहा जाता है यानी यह खेतों में पक कर तैयार होने में पुरे साठ दिन का वक्त लगता है / और जब यह पूरी तरह पक कर तैयार हो जाता है तो ग्रामीण अपनी पुरे वाद्य यंत्रों के साथ खेत में पहुचता है और एक मुठ्ठी धान की बाली तोड़ कर उसे कांसे के बर्तन में नए कपड़ों को बांध कर ढक देता है/

और उसे नई फसल को कूटकर इसमें गुड, और चिवड़ा (कुटा हुआ चावल ) मिला कर देवी अन्नपूर्णा के प्रसाद के रूप में  इसे ग्रहण करता है / यह सिलसिला पुरे महीने चलता और इस दौरान कई धार्मिक आयोजन किये जाते है / जैसा कि मैंने पूर्व में कहा था , यह आयोजन पुरे 15 दिनों तक चलता है /

वर्तमान मे इसे मनाने के स्वरुप में ये परिवर्तन आ गया है कि अब इस दौरान जानवरों की  बलि की प्रथा लगभग ख़त्म हो चुकी है, कहीं-कहीं इस आयोजन में कथित तौर पर बलि प्रथा सुनाई में ज़रूर आती है, मगर यह पूर्ण रूप से धार्मिक आयोजन है / इस दौरान ग्रामीण एक दुसरे के घर जाकर बधाई देते है और नवा खानी की शुभकामनायें देते है /
Photo- (Jagdalpur online)

बस्तर के त्यौहार ! 


बस्तर अनेक प्रकार के रिवाजो के लिए जाना जाता है / यहाँ के त्यौहार भी अलग ही होते है जैसे बस्तर दशहरा – वैसे तो दशहरा पूरे देश में मनाया जाता है और उसका कारण राम की रावण पर विजय है मगर बस्तर में मनाये जाने वाले दशहरा का कारण कुछ और ही है / 
क्या है इसे मनाये जाने का कारण ? बस्तर में इसे क्यों मनाया जाता है ? जानने के लिए क्लिक कीजिये निचे लिखे लिंक पर. 

9/25/2018

Story of Jasdev Singh

 आइये जाने आवाज के जादूगर जसदेव सिंह को

आज मै जो कहने जा रहा हु वह बड़ा ही दुखद है खास तौर पर उनके लिए जो पब्लिक स्पीकिंग को संजीदगी से लेते है /
जसदेव सिंह (photo-google)

आज वो आवाज़ खामोश हो गई जो पिछले 48 वर्षों से स्वतंत्रता दिवस, व् गणतंत्र दिवस को अपनी आवाज से सजीव कर देती थी  / मै बात कर रहा हूँ ग्रेट कमेंटेटर जसदेव सिंह की / 87 वर्ष की आयु में जसदेव की आवाज आज सदा के लिए खामोश हो गई / उनके अमूल्य  योगदान को खेल प्रेमी हमेशा याद करेंगे /

चाहे एशियन गेम्स हो या ओलमपिक या अन्य कोई खेल के आयोजन-  वे अपनी शानदार आवाज से खेल की  कमेंट्री में जान डाल देते थे / खेल मानो एसा लगता था कि आँखों के सामने हो रहा  है / ये बात 1980 के पहले की है / जब आज की मॉडर्न तकनीक नही थी न ही चैनलों की भरमार थी /

मै उस वक्त की बात कर रहा हु जब सूचनाओ के लिए रेडियो या दूरदर्शन हुआ करता था और इंदिरा गाँधी के ज़माने से मै उनको सुनता आ रहा हूँ तथा उनको कॉपी करते हुए मैंने भी कमेंट्री की शुरुवात की थी  और मेरे जैसे अनगिनत लोगों ने निश्चित ही उनका अनुसरण किया होगा  /

आज तो देश में कमेंट्री की परिभाषा ही बदल चुकी है जिसमे कमेंट्री की गरिमा कही धूमिल सी हो रही है / आज के दौर में जहाँ हर दिन एक नया कमेंटेटर आता तो ज़रूर है मगेर वो छाप नही छोड़ सका है जो जेसदेव ने छोड़ा /

पुरस्कार एवम सामान :-

भारत सरकार ने उन्हें उनके अमूल्य योगदान को देखते हुए 1985 में पदम श्री तथा 2008 में पदम भूषण से सम्मनित किया था / 2014 में राजस्थान रत्न से नवाजा गया /
वे दूरदर्शन व आल इंडिया रेडियो एक बहतरीन कमेंटेटर थे / रेडियो पर  80 के दशक में मैच का सही आनन्द जसदेव की कमेंट्री से ही आता था/

जन्म और प्रारंभिक जीवन :-

जसदेव सिंह का जन्म 18 मई 1931 को राजस्थान के बोली गाँव में हुआ और 19 55 से आकाशवाणी जयपुर से उन्होंने बतौर उदघोषक अपने करियर की शुरुवात की /  हालाँकि वे काफी समय जयपुर में ही रहे  खेल आयोजनों की कमेंट्री के वे पहचान बन चुके थे , उन्होंने कमेंट्री को एक नयी परिभाषा दी /

गाँधी जी शवयात्रा की कमेंट्री करने वाले डिमेलो की आवाज ने नन्हे जसदेव सिंह की दिशा ही बदल दी / डिमेलो अंग्रेजी में कमेंट्री कर रहे थे मगर जसदेव को उनका एक एक शब्द अंदर तक भेद रहा था / और यहीं से जन्म हुआ सदी के महान कमेंटेटर जसदेव सिंह का / कहते है तकालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने जसदेव को सुनने लिए लिए सदन की कारवाही रुकवा दी थी /

एसा था जसदेव की आवाज़ का जादू /

नमन उनके निधन पर !

मेरे अन्य ब्लॉग को जानने के लिए क्लिक कीजिये निचे लिंक पर 




9/15/2018

वीडियो स्ट्रीमिंग क्या है ?

एक ज़माना था जब हमें सूचनाओं के लिए सिर्फ रेडियो या अखबारों पर ही निर्भर रहना पड़ता था / खास तौर पर 1980 के पहले ; आप याद करिए हम तक लाइव कवरेज देने का एकमात्र साधन रेडियो ही था / कैसे क्रिकेट के स्कोर को जानने के लिए हम रेडियों को कान से चिपकाये रहते थे ?
Netflix (photo-google)

खैर जो इन्टरनेट के युग में आ गया हो तो उसे ये बात समझ में न भी आये तो ज़रा सोचिये/ वे जब दूरदर्शन बड़े चाव से देखते थे तो क्या उसी चाव से आज देखते है नही न !

आखिर क्यों ? भई हमारे पास आज कई चैनल्स है जो मनोरंजन और ज्ञान का खजाना है /

इस ब्लॉग का उद्देश्य क्या है ? 


आप में से कुछ लोग सोच रहें होंगे कि आखिर मै कहना क्या चाहता हूँ ?
दरअसल ! मै जो कहना चाहता उसे चंद लाईन में समझ लीजिये

जैसे दूरदर्शन के आते ही रेडियो का क्रेज बंद हो गया ! फिर दुनिया भर के चैनल्स के आते ही दूरदर्शन देखने का शौक बंद हो गया (क्योकिं हर  गाने, धारावाहिक वाले चैनल्स आ गए जो सूचना, ज्ञान और मनोरंजन से भरपूर थे )
 Amazon Prime(Photo-Google)

इस बीच ! साफ़ आवाज़ और तस्वीर वाली टीवी आ गई जिसे सबसे पहले टाटा स्काई ने शुरू किया बाद में एयर टेल, विडिओ कोन इत्यादि भी इसी में कूदे तो टाटा स्काई की चमक कुछ कम हुई
फिर इन्टरनेट का विकास होते ही you tube ने तहलका मचा दिया/

अब ज़माना है विडिओ स्ट्रीमिंग का मुझे डर है विडिओ स्ट्रीमिंग के जोर पकड़ते ही कहीं  सारे चैनल्स को अपना धंधा न बंद करना पड़े ( जैसे मोबाइल आते ही एसटीडी, पीसीओ का धंधा बंद हो गया) और जिओ ने तो सारे मोबाइल इन्टरनेट को ही सोचने पर मजबूर कर दिया है /

खैर ! विडिओ स्ट्रीमिंग को लेकर ही आपसे चर्चा करना चाहता हूँ / 

क्या है ये विडिओ स्ट्रीमिंग ? 

जैसे आप आप hotstar , youtube और amazon prime को तो जानते ही होंगे ये सब वीडियो स्ट्रीमिंग के ही उदाहरण है / 
अब सवाल ये उठता है कि टीवी देखने के लिए आपको सेटअप बॉक्स चाहिए, टीवी स्क्रीन 
(मॉनिटर ) चाहिए रिमोट भी ज़रूरत पड़ती है 
(पहले तो उठकर चैनल बदलते थे –आज कल ये  बंद हो गया है )

आपको विडिओ स्ट्रीमिंग के लिए सिर्फ एक इन्टरनेट कनेक्शन चाहिए और इसे आप अपने लैपटॉप , मोबाइल या कंप्यूटर पर कही भी देख सकते है /
  
दूसरी चीज़ है सब्सक्रिप्शन ( यानि पैसा ) टीवी देखने के लिए टीवी वाले को पैसा देना पड़ता है सिनेमा देखने के लिए थिएटर वाले को पैसा देना पड़ता है / - और उनके विज्ञापनों को झेलना पड़ता है मगर यहाँ जो पैसा देंगे वो वाई फाई / डाटा का ही होगा /

विडिओ स्ट्रीमिंग में विज्ञापन नही होते है हालाँकि youtube में कुछ विज्ञापन ज़रूर आते है मगर skip add वाले आप्शन पर क्लिक करके इससे भी छुटकारा आप पा सकते है /

  स्ट्रीमिंग के और क्या फायदे क्या है ?

1.      आप जब चाहे तब अपनी मन चाही फिल्म या वीडियो देख सकते है यानी सिनेमा हाल की तरह आपको समय पर पहुचने का झंझट नही है /  न ही टाइम पर टीवी चालू करने जैसा कोई प्रॉब्लम आयेगा / बिजली चली गयी तो जब आएगी तब देख लेंगे ( बैटरी तो रहती ही है , जब तक चले तब तक देख ही सकते है ) 

2.      विडिओ का कोई हिस्सा अगर आपको न देखना हो तो (जैसे बोरिंग scene या गाना ) तो आगे बड  सकते है/

3.      डाउन लोड कर विडिओ को एक प्लेटफार्म से दुसरे प्लेटफार्म में ले जा सकते है / 

4.      अपने हिसाब से एडिट कर सकते है ( मगर डाउन लोड करना होगा ) कुछ कुछ विडिओ में ये आप्शन बना दिया जाता है कि आप डाउन लोड न कर सके आपने ये youtube में ये देखा या महसूस किया होगा /

अब बात करते है आजकल सबसे ज्यादा जोर है स्ट्रीमिंग वाले विडिओ में वह है  “Originals का!

अब ये Originals क्या है ?


विडिओ फिल्म दिखने के दो साधन हो सकते है जो आप तक पहुचते है/

पहला ये कि बनी बनायीं चीजों को कही से खरीद कर आपको दिखाए जैसे फिल्म “octorber” इस फिल्म को सुजीत सरकार ने सिनेमा हाल में दिखने के लिए बनायीं थी , मगर अमेज़न prime ने इसे खरीद लिया और अपने यहाँ से दिखाना शुरू कर दिया , तो अब ये फिल्म अमेज़न prime पर आपको देखने को मिलेगी और कहीं नहीं ...../

इसी तरह " Game of thrones" को HBO के लिए बनाया गया था मगर “हॉट स्टार”  ने इसे खरीद लिया और दिखाने लगा /
Film poster (Photo- Google)

फिर विडिओ स्ट्रीमिंग वाले प्लेटफार्म ने खुद ही फिल्म बनाना शुरू कर दिया जैसे नेट फ्लिक्स का "House of Card" नेटफ्लिक्स की आपनी फिल्म है जिसे उसने खुद बनाया और अपने प्लेटफार्म में दिखाना शुरू कर दिया , इसने इसे कहीं से ख़रीदा नही और न ही इसे थियेटर या टीवी चैनल के लिए बनाया गया था/  यानि ये ओरिजिनल है 
आप समझ गए होंगे कि विडिओ स्ट्रीमिंग की दुनिया में original किसे कहते है /

तो इस तरह से संचार की  क्रांति परिवर्तन ने  हमें यहाँ तक तो पंहुचा दिया है / अब आगे देखना है, क्या होगा ? 

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कृपया निचे लिंक को ज़रूर पढिये ! 


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भारत की कौन है पहली रिकॉर्डिंग सुपर स्टार  मै एक एसी गायिका और नृत्यांगना की बात करने जा रहा हूँ जिनके करीब 600 गानों की रिकॉर्डिंग ...